सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

True success in life (जिस थाली में खाना उसी में छेद करना )

m 


जिस थाली में खाना उसी में छेद करना 

संसद से ले के हर गली चौराहे पर ये मुहावरा बड़ा प्रचलित हो रहा है। जिसका कारण है हमारे लीजेंड जया बच्चनजी। (मैं यहाँ किसी का समर्थन या असमर्थन नहीं करती ) संसद में उनका बयांन सुनने और न्यूज़ चैनल में डिबेट सुनने के बाद मैं यही सोचती रही की, अगर इस प्रचलित मुहावरे लोकोक्तियों का असली मतलब निकलना हो तो क्या निकाल सकते है?  

इसका सिंपल सा अर्थ होता है की जिसके कारण आप success हुए है उसको बदनाम करना। मगर अब सोच ने की बात ये है की जीस संस्था या इंडस्ट्रीज़ के द्वारा आप सफल हुए हो। जिसके कारन आपकी एक success images बानी हो। उसको कोई नुकसान पहुंचाए उस समय गलत को गलत कहे ना थालीमें छेद करना होगा या चुप चाप उस संस्था को या उस इंडस्ट्रीज़ को बर्बाद होता देखना थाली में छेद करना होगा? क्योकि अगर देखा जाये तो दोनों को ही थाली में छेद करना ही कहेंगे। 

तो क्या करे? उसको एक बहुत ही सिंपल way मैं अगर समजे तो मान लीजिये आपका एक भरा पूरा परिवार है। उसमे एक भाई दूसरे भाई का बुरा करता है, मगर जो भाई दूसरे का बुरा करता है ऊसके आपके साथ सम्बन्थ बहुत ही अच्छे है और जिसका बुरा हो रहा है उस भाई के साथ आपका सम्बन्ध नहीं अच्छा है और न ही बुरा। यानि कोई खास सम्बन्ध नहीं है, या दोनों ही भाई के साथ आपके अच्छे सम्बन्ध है तो आप  क्या करोगे? क्या उस भाई के लिए आवज़ उठाओगे जिसके साथ बुरा हो रहा है या उस भाई का साथ देंगे जो बुरा कर रहा है?

 जब हम ऐसी कोई चीज़ पढ़ेंगे तब हम सब यही कहेंगे की जिसके साथ बुरा हो रहा है उसका साथ देंगे। लेकिन ठहरिये अपने आस पास अपने परिवार और अपने समाज में देखिए। क्या ऐसा नहीं होता है? और हम तब किस का साथ देते है? या समाज किसका साथ देता है? हम सब आँख चुराते है, हम कहेंगे हमें क्या? ये हमारा काम नहीं है। हम बात को टालने का प्रयास करेंगे। और जब दूसरे हमें अपने दायित्व के प्रति सजग करेंगे तो हमारे मुँह से भी ऐसे ही statement और 500 मुहावरे निकलेंगे जो संसद में निकला। 

मेरे हिसाब से जिस 'थाली में खाना उसी में छेद करना वो है' की, जिस देश में, जिस समाज में, जिस संस्था में आप रहते हो, जिसके कारन आज आपका एक success statues उसका बुरा करना या कुछ बुरा होता हुआ देख के भी चुप रहना। 

बुराई इस लिए नहीं बढ़ी की बुरा करने वाले लोग बढ़ गए है, इसलिए बढ़ी है की अच्छे लोग चुप है।                                                                           --चाणक्य। 

     चाणक्य की ये बात आज सदियों के बाद भी सच लग रही है। आज अच्छे लोग चाहे वो कोई भी हो वो बोलने की बजाय चुप रहना पसंद करते है। 'हमें क्या?' ये मानसिकता आज हमारे समाज को बर्बादी की कगार पर लेकर आई है। और हमारी कायरता का खामियाज़ा हमारे आने वाले पीढ़ी भुगतेंगी (भुगत रही है)। 

आज हालत ये है की कोई भी किसी  का भी बिंदास मर्डर कर सकता है, बलात्कार कर सकता है, एसिड फेक सकता है, भारत तेरे टुकड़े होंगे तक के जुमले बोल सकता है। उन लोगो को कोई डर नहीं है क्योकि वो जानते है की बुरे लोग तो उनका साथ देंगे ही मगर अच्छे लोग भी चुप ही रहेंगे। कोई उनका कुछ नहीं बोलेंगे। अगर गलती से भी एक अच्छे इंसान ने आवज़ उठाई तो सारे लोग उसको वाणीस्वातंत्रता के नाम पर या 'थाली में' छेद जैसे बात कहे कर चुप जरूर करा देंगे। 

क्योकि वो लोग जानते है की अगर गलत को गलत कहेंगे तो वो लोग हमें नहीं छोड़ेंगे, हम बर्बाद भी हो सकते है।  मगर सही को गलत  कहने से हीरो जरूर बन जायेंगे। इसमें दोष उनका नहीं हमारा है। हमने काच के टुकड़ो को हिरा समज कर अपने सर पे सजाया है।  अगर हम गलत को गलत न बोल पते तो कोई बात नहीं थी। मगर सही को गलत बोलना हमने चालू किया वही हमारे पतन की  बजह है। आज हमें अपनी मानसिकता को चेंज करना होगा। 

वो मान सम्मान, वो प्रतिष्ठा, वो पैसा किस काम का जब आप गलत को गलत और सही को सही नहीं बोल सकते?
क्या डर सताता है हमें? जिसकी बजहसे आज हम जिसकी बदौलत इतने सफल है उसको बर्बाद होता देख कर भी चुप है। क्या ये समझदारी है? क्या हमारे चुप रहनेसे हम उसके दुष्परिणामों से बच सकते है? कभी नहीं। हम जिस समाज का हिस्सा होते है, उसका प्रभाव हमारे जीवन पर भी आज नहीं तो कल पड़ता ही है। अगर हम ये मान के चुप बैठ जायेंगे की हमारे चुप रहने से हम उससे बच सकते है तो ऐसा बिलकुल ही नहीं होगा।

दरअसल आज कल एक गलतफहमी हमारे मानस में आ गयी है की ( या डाली गई है। ), सफल उसीको कहेंगे जिसके पास खूब पैसा हो या जिसके पास लोग उसके आगे पीछे घूम रहे हो। सफल होने का अर्थ केवल ये नहीं होता की खूब पैसा कमाओ या नाम कमाओ आप अच्छा काम कर के या अन्याय के विरुद्ध आवाज उठा कर भी सफल बन सकते है।

 महात्मा गाँधी उसका उत्तम उदहारण है। उनके पास न ही बाह्य व्यक्त्व था, न ही पैसा और वो अपने करियर में भी फ़ैल हो चुके थे। यानि हर मोर्चे पर वे unsuccessful थे। मगर फिर भी वो आज हमारे father of nation कहलाते  है,  क्योकि उन्होंने  गलत कहने की न केवल हिमत जताई मगर उनके विरूद्ध लडे भी। ये है असली हीरो और असली  सक्सेस।  गांधीजी, सुभासचन्द्र बोज़, भगत सिंह को सफल नहीं कहेंगे? उनके पास कितना पैसा था? फिर भी वो सफल हुए है। ये कुछ नाम है जो हम जानते है, मगर ऐसे हज़ारो लोग थे जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया था,  उसको सफल नहीं कहेंगे? 

ये जो मनसिकता आ गई है की नेता अभिनेता और बड़ी गाड़ी, बड़ा घर उसीको सफलता कहते है, उसको चेंज करना होगा। हमें और हमारे बच्चो को ये new success quotes सीखना होगा, उनको सीखना होगा की कम पैसा कमाओ मगर वो पैसा महेनत और ईमानदारी का होना चाहिए और जो ऐसा करता है वही सच्चा हीरो है। हमारे देश के जवान, हमारे पुलिस और वो हर एक इंसान जिसकी वजहसे हम हमारे घर में सुरक्षित है वो है सच्चे हीरो और ऐसा बने के लिए उनको पप्रेरित करना होगा। 



वरना सफल होने के चक्कर में हमारे बच्चे ऐसे दलदल में फस  जायेंगे की फिर उसको नहीं कोई सम्पति बचा पायेगी और नहीं कोई फेम। 


 








टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Yeh Rishta Kya Kehlata Hai / रिश्ता किसे कहते हैं ?

  रिश्ता किसे कहते हैं ?/rishta kise kahate hain. rishte ehsas ke hote hain दोस्तों, आज कल 'ये रिश्ता क्या कहलाता है' फेम दिव्या भटनागर बहुत चर्चा में है। उसकी मौत तो covid 19 के कारन हुई है।  लेकिन उसके परिवार और friends के द्वारा उसके पति पर उनकी मौत का इल्जाम लगाया जा रहा है। ( हम यहाँ किसी पर भी आरोप नहीं लगाते, ये एक जांच का विषय है। )  ऐसा ही कुछ सुंशांत सिंह राजपूत के मौत के वक्त भी हुआ था। उनके मृत्यु के बाद उनके परिवार और friends ने भी ऐसे ही किसी पर आरोप लगाया था। उनकी मौत का जिम्मेदार माना था।  इनकी स्टोरी सच है या क्या जूठ ये हम नहीं जानते, न ही हम उसके बारे में कोई discussion करेंगे।  मगर ये सुनने के बाद एक विचार मेरे मन में ये सवाल उठा की ये हो-हल्ला उनकी मौत के बाद ही क्यू ? उनसे पहले क्यों नहीं? अब ऐसा तो नहीं हो सकता की उनके रिश्तेदारों को इस चीज़ के बारे में बिलकुल पता ही न हो?  ये बात केवल दिव्या भटनागर या सुशांत सिंह राजपूत की ही नहीं है। ये दोनों की story तो इसलिए चर्चा में है, क्योकि ये दोनों काफ़ी successful हस्तिया थी।  मगर हमने अपने आसपास और समाज में भी ऐ

5 Tips Life me Khush Kaise Rahe In Hindi

   life me khush rehne ke tarike/ happy life tips in hindi दोस्तों, जब से ये दुनिया बनी है तब से आदमी की एक ही इच्छा रही है के वे अपने जीवन में हमेश खुश रहे। चाहे वो पाषाण युग हो या आजका 21st century हो। हमारा हर अविष्कार इसी सोच से जन्मा है। चमच्च से ले कर रॉकेट तक हमने इसीलिए बनाये है ताकि हम अपने जीवन में खुश रहे।  आज 21st century में तो हमारे जीवन को आसान और खुश रखने के लिए  gadgets की तो मानो बाढ़ सी आ गयी है। चाहे घर का काम हो या ऑफिस का चुटकि बजा कर हो जाता है। घर बैठे मिलो दूर अपने अपनों से न केवल बात कर सकते है मगर उसको देख भी सकते है।  आज internet ने अपना साम्राज्य इस कदर फैलाया है की, दुनिया के किसी भी कोने में क्या हो रहा है वो आप दुनिया के किसी भी कोने में बेठ कर देख सकते है। आज से पहले इतनी सुविधा कभी पहले नहीं थी। हर बात में आज का युग advance है।  शायद ही ऐसा कोई मोर्चा हो जहा पर हम ने तरक्की न करी हो। पर अब सवाल ये उठता है की इतनी तरक्की करने के बाद क्या हमने वो हासिल किया है जिसके लिए हमने इतनी तरक्की करी है? आज हमारे पास सबसे बढ़िया गाड़ी है, घर है, कपडे है, घडी है, जुते

kya bacho ko mobile dena chahiye?

  क्या बच्चो के लिए खतरनाक है मोबाइल? दोस्तों, क्या बच्चो को मोबाइल देना चाहिए? ये सवाल आज के युग का एक बहोत ही बड़ा सवाल है। हर माँ बाप को ये सवाल सताता है की क्या हमें अपने बच्चो को मोबाइल देना चाहिए या नहीं ? इस पर एक लम्बी चौड़ी कभी न ख़तम होने वाली बहेस होती है और होती रहेगी। लेकिन यहाँ कुछ point पर ध्यान देना भी बहुत ही जरुरी है।  सबसे बड़ा सवाल ये है की बच्चो को मोबाइल की क्या जरुरत है? मोबाइल का उपयोग हम आमतौर पर किसी से बाते करने में, अपने ऑफिस वर्क के लिए या लोकशन सर्च के लिए होता है। ये सारे ज़रूरी काम है जो बिना मोबाइल के नहीं हो सकता राइट? तो अब सवाल ये उठता है की बच्चो को मोबाइल क्यों जरुरी है? बच्चो को नहीं किसी से जरुरी बात करनी होती है, और न ही ऐसा कोई काम जो बिना मोबाइल के पूरा न होता हो। बाहर वो हमारे साथ जाता है। पूरा दिन वो स्कूल या collage में अपने friends के साथ  होता है, और यदि  कुछ काम हो तो वो हमारा फ़ोन use कर सकता है। मुझे नहीं लगता की ऐसा कोई एक कारन हो,  जिसकी बजह से हमें अपने बच्चो को उनका खुद का मोबाइल खरीदकर देना पड़े।   दोस्तों, हम अपने बच्चो को मोबाइल क्यों