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Key of Success in Hindi/apne aap ko pehchano

 success के लिए अपनी कीमत पहचाने। 

success and motivation blog. know your self is key of success. bina apni kimat jane ham jivan me safal ho hi nahi sakte .


अपने आप को जान, क्या है तेरी पहचान, भूल मत ए इन्सान, बनानी है तुजे इस दुनिया में अपनी शान।

दोस्तों, आज कल motivation और success के लिए बहोत सारे क्लासिस start हुए है। ऑनलाइन भी हमें कई सारे blogs और videos भी मिलेंगे। successful लोगो के बारे में जानकारी भी देते है। कैसे उन्होंने अपने जीवन में संघर्ष किया और सफल (success in life)  हुए वगैरा। 

उन सब में एक बात common है की हमें संघर्ष से डरना नहीं है। हमें मुश्किलों का हमेशा सामना करना चाहिए तभी हमें सफलता मिलेगी। ये बाते सच भी है, पर यहाँ पे एक बात भूल रहे है। हम जीवन में तभी सफल हो सकते है जब वो टैलेंट हमारे अंदर हो। 

क्या हमें अपनी टैलेंट का पता है? क्या हम जानते है की हम में कितनी शक्ति है? हम में से ज़्यादातर लोग हर समय अपने आप को कमजोर ही समज ते है। किसी भी tenanted या successful लोग की बात सुनेंगे या movie देखेंगे तब वो अपने आप को कोस ते हुए ही नजर आएंगे। 

 दोस्तों, हमें सारी दुनिया का ज्ञान है, हमें सब पता है। पर हमें अपने आपके बारे में ही पता नहीं है। हमारे अंदर क्या शक्ति है, क्या टैलेंट है यही हमें पता नहीं होता।  नतीजा ये होता है की हम अपना पूरा जीवन बहार की खोज में ही व्यतीत कर देते है।  

बहुत ही कम खुशनसीब लोग  जिनको दूसरे उनके अंदर छुपे हुआ टैलेंट को पहचानकर आगे बढ़ाते है। इनसे भी कम नसीबवाले वो लोग होते है जो दूसरे के दिखाने पर अपने में छुपे हुए टैलेंट को पहचान कर जीवन में सफल होते है। 

इस बात को हम एक कहानी  (success story) के जरिये समजते है। ये बात को समज ने में ज्यादा आसान होगा। 

एक बार एक रेल्वे स्टेशन के बहार एक भिखारी बैठा था। वो वहां से हर गुजर ने वाले से भीख मांग रहा था। वहा पे एक शेठजी आये। भिखारी ने अपनी आदत के मुताबिक उस शेठजी से भी भीख माँगी। 

शेठजी ने भिखारी को देख कर कहा की, 'तुम हमेंशा दुसरो से मांगते ही क्यों हो? कभी किसी को कुछ दिया भी है?' भिखारी ने बड़े ही बेबस हो कर कहा की,'मैं एक भिखारी हूँ, मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। हमेश लोगो से मांगता ही रहता हूँ। मेरी इतनी औकात ही कहा की मैं कसी को कुछ भी दे सकू। भला मैं आप को क्या दे सकता हूँ' ? 

शेठजी ने कहा, ' जब तूम किसी को कुछ दे नहीं सकते तो मांगते भी क्यों हो? तुम्हे मांगने का अधिकार तभी होगा जब तुम किसी को कुछ दे पाओ। मै तो एक व्यापारी हूँ। मै तो लेंन देंन में ही विश्वास करता हूँ। अगर तुम्हारे पास कुछ देने के लिए है तभी मैं बदले में तुम्हे पैसे दूंगा। नहीं तो नहीं दूंगा। 

इतना कह कर वो सेठजी ट्रैन में बैठ कर चले गए। उनके जाने के बाद भिखारी सोचता रहा। भिखारी को शेठजी की बात दिल पर लग गयी थी। उसको लगा की वो शेठजी सच ही बोल रहे है, जब तक मैं किसी को कुछ देता नहीं मुझे लेनेका अधिकार भी नहीं है। 

मुझे भीख में उतने पैसे भी नहीं मिलते जितनी मुझे जरुरत है। क्योकि मैं किसी को कुछ देता नहीं हूँ। केवल मांगता ही हूँ। लेकिन मैं किसी को भला क्या दे सकता हूँ? मै तो एक भिखारी हूँ। किसी को कुछ देने के लायक भी तो नहीं हूँ। पर मैं कब तक लोगो से केवल मांगता ही रहूँगा? मुझे कुछ देना भी चाहिए। 

बहुत सोच ने के बाद उसने ये निर्णय लिया की अब से मैं केवल माँगूगा ही नहीं। जो भी मुझे पैसा देंगे उसके बदले में मैं भी उसको कुछ ना कुछ जरूर दूंगा। पर मैं लोगो को क्या दू? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। 

इस बात के बारे में उसने बहुत सोचा पर उसको कोई जवाब नहीं मिला। कई दिन गुजर गए पर भिखारी को समज नहीं आ रहा था की वो लोगो को भीख के बदले में क्या दे ? तभी उसकी नजर स्टेशन के आस पास उगे फूलो पे पड़ी। उसने सोचा की क्यों न में ये फूल ही लोगो को दू? उसको अपना ये विचार बहुत ही अच्छा लगा। 

उसने कुछ फूल को तोड़े। अब जब भी लोग उसको पैसे देते तो वो वो बदले में उसको कुछ फूल दे देता। लोगो को भी बहुत ही अच्छा लगता। अब वो रोज यही करने लगा। 

कुछ दिनों के बाद उसको ये महसूस हुआ की अब लोग उसको बहुत ही ज्यादा पैसे देने लगे है। लोग सामने से उसके पास आकर ज्यादा भीख देने लगे है। वो रोज सुबह जल्दी उठकर स्टेशन के पास जाकर सारे फूल को तोड़ लता था। जब तक उसके पास वो फूल रहते लोग उसको लोग भीख देते। जब फूल ख़तम हो जाते तो उसको भीख मिलनी भी बंध हो जाती थी। पर वो उससे संतुष्ट था। 

एक दिन वो ऐसे ही फूल तोड़कर स्टेशन के पास बैठा था, तभी उसकी नजर उस सेठजी पर पड़ी। वो उसको पहचान गया। वो दौड़ कर शेठजी के पास पहुंच गया। उसने भीख मांगते हुआ कहा की, 'उस दिन मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं था, पर आज मेरे पास ये फूल है। आप मुझे भीख दे तो मैं आपको बदले में ये फूल दूंगा' 

शेठजी भी उस भिखारी को पहचान गए। उनको बहुत ही ख़ुशी हुए। उन्होंने कुछ पैसे भिखारी को देते हुए कहा की, ' वाह क्या बात है? आज तुम भी मेर्री तरह एक व्यापारी बन गए हो।' इतना कह कर वो चले गए। 

शेठजी तो चले गए, पर उनके जाने के बाद वो भिखरी उनकी कही बात सोचता रहा। उसकी आखो में एक अजीब ही चमक थी। उसको लगा की उसके पास एक सफलता की चाबी (key of success) लग गयी है। जिसके द्वारा वो अपने जीवन को बदल सकता है। 

वो उत्साहित हो कर कहने लगा मैं एक भखारी नहीं हूँ, मैं तो एक व्यापारी हूँ। ये कह कर वो जोर जोर से हसने लगा और नाचने गाने लगा। लोगो को लगा के ये भिखारी पागल हो गया है। अगले दिन से वो भिखारी उस स्टेशन पर फिर कभी नहीं दिखा। 

उससे  २-३ वर्ष के बाद एक ट्रैन में दो व्यक्ति शूट बूट पहनकर यात्रा कर रहे थे। तभी उन में से एक व्यक्ति ने दूसरे को देखा, देखते ही उसने दूसरे व्यक्ति के पैर पकड़ लिए। हाथ जोड़ कर बोला, ' क्या आप ने मुझे पहचाना? 

शेठजी ने कहा की, 'क्या हम पहले कभी मिल चुके है? मुझे याद नहीं आ रहा। '

तब पहले व्यक्ति ने बोला की, 'आप याद कीजिये. दो-तीन साल पहले हम मिले थे। मैं वोही भिखारी हूँ जिसको आपने कहा था की, हमें मांगने का हक्क तभी है जब हम उसके बदले में कुछ दे। आपने मुझे सिखाया की जीवन में हमें क्या करना चाहिए। और दूसरी बार आपने मुझे बताया की मैं भिखारी नहीं बल्कि व्यापारी हूँ। 

उसका नतीजा ये हुआ की आज में फूलो का एक बहुत ही बा व्यापारी बन चूका हूँ। अपने कारोबार के सिलसिले में ही मैं बाहार जा रहा हूँ। 

अपने मुझे पहली मुलाकात में ये प्रकृति का ये नियम समझाया की, हमें तभी कुछ मिल सकता है जब हम किसी को कुछ दे पाए। लेंन देंन का ये नियम वास्तव में बहूत ही काम का है। ये बात मैने महसूस भी की थी। पर मैं फिर भी अपने आपको भिखारी ही समझता रहा। उससे ऊपर उठ कर मैं कभी भी सोच ही नहीं पाया। 

पर जब हम दूसरी बार मिले तब आपने मुझे कहा की मैं भिखारी नहीं बल्कि व्यापारी हूँ। आज में पूरा व्यापारी बन चूका हूँ।' 

दोस्तों, भिखारी ने जब तक अपने आपको भिखारी समजा वो भिखारी रहा। जब उसने आपने आपको व्यापारी समजा वो व्यापारी बन गया। 

हमारे शास्त्रों में भी सब से ज्यादा जोर अपने आपको पहचान ने को दिया है। 

शिवोभुत्वा शिवम् यजेत। ( शिव बन कर शिव की पूजा करनी चाहिए। 

अब हमें ये तय करना है की हमें पूरा जीवन भिखारी बन कर व्यतीत करना है या व्यापरी बनकर। 

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