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Pitamah Bhishma se sikhe safal logo ko kya nahi karna chahiye

successful/सफ़ल लोगो को क्या नहीं करना चाहिए?

successful logo kya nahi karna chahiye. ye ek bahut hi mahtv purn baat hai .kyoki safal logo kya karna chahiye ye to hame pata hai .par kya nahi karn chahiye, ye hame nahi pata, ye sikh hame mahabhart ke sab se mahan youdhaa ke jivan me se milti hai .


दोस्तों, आज मकरसंक्रांति है। हम सब जानते है की आज के दिन के कई जगहों पर पतंग चढ़ाई जाती है। कई जगहों पर लोहरी भी मनाई जाती है। पर आज मै उस बात को नहीं कहूँगी, क्योकि उनके अनेक सरे ब्लॉग भी है।  काफी कुछ जानते भी है। 

आज का मेरा ब्लॉग मकरसंक्रांति से जुड़े हुए योद्धा की है। जी हां, वो है भीष्म पितामाह। महाभारत का एक शसक्त पात्र। एक ऐसा व्यक्त्व न केवल आज संभव है पर उस समय भी संभव नहीं था। हमारा इतिहास एक से बढ़कर एक योद्धा ओ से भरा हुआ है। पर भीष्म के जैसा कोई नहीं। 

जैसा की हम जानते है की महाभारत के युद्ध के दौरान वे लगभग ८ दिनों  तक बाण सैय्या पे थे। उनको इच्छा मृत्यु  वरदान था। वे आज ही के दिन यानि मकर संक्रांति के दिन उन्होंने प्राण त्याग किये थे। 

दोस्तों, महभारत में सब से ताकतवर पात्र अर्जुन को या कृष्ण को मानते है। पर मेरे हिसाब से महभारत में सब से ताकतवर  कोई है तो वो है पितामह भीष्म (success in life)। जब वे महाभारत के युद्ध में उतरे थे तब उनकी आयु लगभग १८३ वर्ष की मानी जाती है। उनको महाभारत युद्ध में लड़वाने के लिए कर्ण जो भारत का ही नहीं बल्कि विश्व का सबसे महान यौद्धा था उसको बाहर बैठना पड़ा। 

इसी एक बात से हमें उनकी क्या महत्ता थी वो पता चलता है। और तो और भगवन श्री कृष्ण और उनके सखा सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी अर्जुन  मिल कर भी उनको हराना तो दूर उनको कॉन्ट्रोल भी नहीं कर पाए थे। उनको हराने की टिप्स खुद उनसे ही छल कर के लेनी पड़ी। छल कर के १८३ साल के बूढ़े को रणभूमि से दूर  करना पड़ा। इसी से वे कितने महान और आज के language की बात करे तो कितने successful इन्सान होंगे उसका पता चलता है।

इतने महान और सफल इंसान होने के बाद भी जब भी  सफल लोगो के बारे में बात कर ते है, तब उनका नाम तक हम नहीं लेते ऐसा क्यों? 

दोस्तों, पितामह भीष्म के जीवन से हमें सफल कैसे बने ये नहीं सीखें है, बल्कि एक बार सफल होने के बाद क्या नहीं करना है ये सीखना है। 

कभी गलत का साथ मत दो। 

दोस्तों, पितामह भीष्म ने केवल एक ही गलती की थी वो ये की उन्होंने गलत का  हमेशा ही साथ दिया। उन्होंने हमेशा दुसरो के गलत निर्णय में ही साथ दिया। वो चाहे अपने पिता के विवाह के कारण अपनी ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा हो। या फिर भीम को विष देना हो। लाक्षागृह हो या द्रोपदी वस्र हरण। वे हमेशा गलत पक्ष में ही खड़े पाए गए। 

उनमे  उनका कोई स्वार्थ या लाभ नहीं था। न ही उन्हों ने ये षड़यंत्र रचे थे। पर सब कुछ जानते हुए भी चुप रहे कर उनके साथ खड़े रहना भी मूक साक्षी ही मानी जाती है। 

दोस्तों, success बहोत ही महेनत करने के बाद मिलती है। उसके लिए कई सालो की तपस्या, कई सैक्रिफाइस  किये होते है। कई मुश्केलिया और चुनौतियों का सामना करना पड़ा होता है। तब जाके लोग सफल होते है। 

जितनी सफलता मिलनी मुश्किल है उससे भी कई बढ़ कर उस सफलता को टिकाए रखना मुश्किल होता  है। इसी डर में की कही मिली सफलता हमसे दूर न हो जाये। न चाहते हुए भी कई successful लोग गलत का साथ देते है। या गलत के साथ खड़े हुए पाए जाते है। 

कई बड़ी स्कूल में बच्चो के साथ हुई ज्यागति, या बड़े बड़े अस्पतालों में गलत काम को नजरअंदाज करना, या उस पर पर्दा डालना उसके उदहारण है। उस समय हमें ये समज में नहीं आता की लोग इस बात को नजरंअदाज या रफ़ा दफ़ा कैसे कर सकते है? उसको कैसे दबा ने में किसी की भी मदद कर सकते है? 

उसका असली कारण ये होता है की, उस institute को बनाने में उस इंसान ने अपना पूरा जीवन समर्पण किया होता है। ऐसे हादसों से उनको एक ही डर होता है की कही उनकी पूरी जीवन की महेनत पानी में न मिल जाये। यही सोच कर वो गलत का साथ देने के लिए तैयार होते  है। 

 पितामह भीष्म के साथ भी यही हुआ। उनके पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने पिता बन कर उनके दोनों  भाइओ  को पाला। दोनों भाई निर्वंश ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। वे खुद अपनी प्रतिज्ञा के चलते विवाह नहीं कर सकते थे। तब सवाल ये आया की अब गद्दी पर कौन बैठेगा? 

व्यास जी की कृपा से धूतराष्ट्र और पांडु का जन्म हुआ। उनमे भी धूतराष्ट्र अंध जन्मे। पांडू को राजा बनाया तब लगा की अब सब कुछ ठीक हो जायेगा, पर तभी पाण्डु को श्राप लगा और वो सब कुछ छोड़कर जंगल चले गए।   

बड़ी ही मुश्किल से उन्होंने अपने परिवार को संभाला था। बहुत ही कष्ट सहे, उन्होंने अपना पूरा जीवन बलिदान  अपने परिवार के लिए यदि हम ये कहे तब भी गलत नहीं होगा। उतनी मुश्किलों के बाद जब उन्होंने अपने ही परिवार में गलत होते देखा तो उन्होंने अपनी आखे मूंद ली। बस यही उनकी सब से बड़ी गलती थी। 

यदि हम गौर से देखे तो हमारे परिवार में या समाज में यही होता है। हम हमेशा उसीको समजाते है जिसके साथ गलत होता है। जो गलत करता है उसको कोई नहीं कहता। परिणाम ये आता है की गलत करने वाला और गलत करता है उनके जुर्म बढ़ जाते है। जब सहने वाले की सहनशक्ति ख़त्म हो जाती है तब महाभारत का जन्म  होता है।

 दोस्तों, कसी भी समस्या का निवारण उसके प्रति आखे मूंदना नहीं होता। यदि पितामह भीष्म ने बिना डरे दुर्योधन की पहली गलती का विरोध किया होता तो आज इतिहास कुछ अलग ही होता। किन्तु वेनहीं कर पाए। reason है की इतने महान योद्धा को आज हम याद तक नहीं करते। 

कोई भी गलत काम कभी सही नहीं होता। चाहे हम उसको नजर अंदाज करे या उसको छुपाये। जो भी successful लोग कामियाबी के  गिरे है उनकी main reason यही है की, उन्होंने या तो  गलत का साथ दिया है। 

 यदि हम गलत कर के सफल नहीं हो पाते तो गलत का साथ देकर वो सफलता कैसे प्राप्त कर सकते है? यद् रहे यदि गाल कर के मिली हुई या टिकी हुई सफलता कभी कायमी नहीं होती। एक न एक दिन उसका नष्ट होना तय है। पर जब वो नष्ट होती है तो हमारा सब कुछ छिन के वो  नष्ट होती है। 

 हमें अहसास होता है तब तक हमारे हाथ में कुछ भी नहीं था। जैसे भीष्म पितामह के हाथ में कुछ नहीं था जब वे बाण शैया पे लेटे थे। 

दोस्तों आज मकरसंक्रांति के इस पावन अवसर पर हम अपने आप से ये वादा करे की, न ही हम गलत करेंगे और  गलत का साथ देंगे। क्योकि गलत करना और उसका साथ देने का [परिणाम केवल और केवल महाभारत ही होता है। 

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